Sri Ramar Temple, Ayodhya
Thiru Ayodhi
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सप्त मुक्ति क्षेत्रों (सप्त मोक्ष पुरियों) में से एक।
Sthala Purāṇam
उत्तर प्रदेश में सरयू नदी के तट पर स्थित थिरु अयोध्या वह दिव्य देसम है जो भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम का महिमामंडन करता है। मूल मूर्ति श्रीराम हैं, जिन्हें चक्रवर्ति थिरुमगन और रघुनायकन के रूप में पूजा जाता है, अपनी प्रिय सीता पिराट्टि के साथ। अयोध्या सूर्य वंश अर्थात सौर कुल के इक्ष्वाकु या रघु वंश की राजधानी थी। रामायण से लिए गए स्थल पुराणम के अनुसार, निःसंतान राजा दशरथ ने कुलगुरु ऋषि वसिष्ठ के मार्गदर्शन में पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया, और विष्णु राम के रूप में अवतरित हुए, जो यहीं जन्मे ताकि वंश को आशीर्वाद दें और पृथ्वी पर धर्म की पुनर्स्थापना करें। राम अयोध्या में पले-बढ़े, इसी नगर से अपने राज्य पर शासन किया, और अपने अवतार के अंत में सरयू के जल के माध्यम से अपने दिव्य धाम परमपद को लौट गए। यह नगर सप्त पुरी अथवा मोक्षपुरियों में से एक के रूप में पूज्य है—अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका और द्वारका—ये सात पवित्र नगर जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्रदान करने वाले माने जाते हैं। सरयू नदी मंदिर के तीर्थम के रूप में सेवा करती है, परमपद सत्य पुष्करिणी के साथ, और परंपरा में अन्य तीर्थम भी गिनाए गए हैं जिनमें इन्द्र, नरसिंह, पापनाश, गज, भार्गव और वशिष्ठ तीर्थम सम्मिलित हैं। एक दिव्य देसम के रूप में थिरु अयोध्या नालायिर दिव्य प्रबन्धम में महिमामंडित है, जिसे पेरियाऴ्वार, कुलशेखर आऴ्वार, तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार, नम्माऴ्वार और थिरुमंगै आऴ्वार सहित अनेक आऴ्वारों से मंगलाशासनम प्राप्त हुआ है, जिनके पासुरम राम और उनके जन्म एवं शासन की पवित्र नगरी को सम्मान देते हैं।
Mangalāśāsanam — the Āḻvār pāsurams
The Lord Rama (Chakravarthi Thirumagan) with Sita (Sita Piratti) of Thiru Ayodhi is glorified in 13 pāsurams by:
थिरु अयोध्या—श्रीराम (चक्रवर्ति थिरुमगन) की जन्मभूमि—को अनेक आऴ्वारों ने महिमामंडित किया है, जो राम और अयोध्या नगरी का गुणगान करते हैं। सबसे प्रसिद्ध मंगलाशासनम कुलशेखर आऴ्वार का अंतिम दशक है, पेरुमाळ् थिरुमोऴि 10 ('अंगणेडु मदिळ्'), जो 'प्राचीरों से घिरी अयोध्या' में राम के जन्म से लेकर उनके आरोहण तक संपूर्ण रामायण का वर्णन करता है, यद्यपि कुलशेखर इस दशक को थिरुचित्रकूटम के शयन राम के इर्द-गिर्द रचते हैं। पेरियाऴ्वार (उदाहरण के लिए कण्डम् कडिनगर दशक में), तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार, थिरुमंगै आऴ्वार और नम्माऴ्वार भी राम तथा अयोध्या की स्तुति करते हैं; इनपुट में कुल लगभग 13 पासुरम सूचीबद्ध हैं। कुलशेखर के रामायण दशक का प्रथम पद्य (10.1, पद्य 741) ऊपर शब्दशः उद्धृत है। टिप्पणी: विशेष रूप से अयोध्या का नाम लेने वाले प्रति-आऴ्वार पासुरमों की सटीक संख्या स्रोतों में भिन्न होती है, इसलिए व्यापक उल्लेख मध्यम निश्चितता रखता है।
அங்கணெடுமதிள்புடைசூழயோத்தியென்னும் அணிநகரத்துலகனைத்தும்விளக்கும்சோதி வெங்கதிரோன்குலத்துக்கோர்விளக்காய்த்தோன்றி விண்முழுதுமுயக்கொண்டவீரன் தன்னை செங்கணெடுங்கருமுகிலையிராமன் தன்னைத் தில்லைநகர்த்திருச்சித்ரகூடந்தன்னுள் எங்கள்தனிமுதல்வனையெம்பெருமான்தன்னை என்றுகொலோ? கண்குளிரக்காணும்நாளே.
angaNedu madhiL pudai sUzh ayOththi ennum aNi nagaraththu ulagu anaiththum viLakkum sOdhi / vengadhirOn kulaththukku Or viLakkAyth thOnRi viN muzhudhum uyakkoNda vIran thannai / sengaN nedu karu mugilai irAman thannai thillai nagar thiruchchithrakUdam thannuL / engaL thani mudhalvanai emperumAn thannai enRukolO kaN kuLirak kANum nALE
The radiant light that illumines all the worlds, who appeared as a lamp of the Sun's (Solar) dynasty and as a hero rose the whole heaven-world up — the red-eyed one dark as a great cloud, Rama, born in the beautiful city girt by great fair ramparts called Ayodhya, who now dwells within Thiruchitrakootam in Thillai (Chidambaram) — our sole primordial Lord: when, O when, will be the day I behold him to my eyes' content?
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